प्रहरी न्यूज की जमीनी पड़ताल में पीड़ित परिवार और सहेली की मां ने आयोग उपाध्यक्ष के सामने रखी पूरी कहानी, थाना पहुंचे एमडी ठाकुर ने TI को लगाई फटकार, फरार आरोपी की जल्द गिरफ्तारी के निर्देश,
प्रहरी न्यूज छुरिया – नाबालिग छात्रा से कथित शोषण के मामले में प्रहरी न्यूज की जमीनी पड़ताल के दौरान कई गंभीर आरोप और सवाल सामने आए हैं,
पीड़ित परिवार का आरोप है कि नाबालिग छात्रा को स्कूल के एक शिक्षक और एक अन्य व्यक्ति द्वारा लंबे समय से परेशान किया जा रहा था, मामला तब सामने आया जब मानसिक रूप से परेशान बालिका ने अपने परिवार, अपनी सहेली और सहेली की मां को पूरी बात बताई,
मामले की गंभीरता को देखते हुए छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के उपाध्यक्ष श्री एमडी ठाकुर पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे, इस दौरान प्रहरी न्यूज की टीम भी मौके पर मौजूद रही, आयोग उपाध्यक्ष ने पीड़ित परिवार और बालिका की हिम्मत बनकर सामने आई उसकी सहेली की मां से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली,
तीन साल से परेशान करने का आरोप
पीड़ित परिवार ने आयोग उपाध्यक्ष को बताया कि उनकी नाबालिग बालिका को स्कूल के एक शिक्षक द्वारा करीब तीन वर्षों से परेशान किए जाने का आरोप है, परिवार के अनुसार, एक अन्य व्यक्ति पर भी बालिका को परेशान करने के आरोप हैं,
गिरफ्तार आरोपी – तिलक यदु (शिक्षक)

परिवार का कहना है कि लगातार परेशान किए जाने से बालिका मानसिक रूप से परेशान हो गई और आखिरकार उसने अपने परिवार, अपनी सहेली तथा सहेली की मां को पूरी बात बताई, इसके बाद पीड़िता और उसका परिवार, सहेली की मां के साथ शिकायत दर्ज कराने गैंदाटोला थाना पहुंचे,
थाने पहुंची नाबालिग, लेकिन FIR के बजाय समझौते का आरोप,
सहेली की मां और पीड़ित परिवार का आरोप है कि थाने पहुंचने के बाद तत्काल FIR दर्ज करने के बजाय मामले को समझौते के जरिए खत्म करने का प्रयास किया गया, उनके अनुसार, थाना प्रभारी ने आरोपी पक्ष, स्कूल के प्राचार्य और स्टाफ को भी थाना बुलाया था, सभी को बैठाकर पूछताछ की गई, पीड़ित बालिका ने कथित तौर पर WhatsApp चैट और अन्य साक्ष्य पुलिस के सामने रखे और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की, बावजूद इसके, पीड़ित पक्ष का आरोप है कि थाना प्रभारी द्वारा बार-बार समझौता करने पर जोर दिया गया,
सवाल यह है कि जब एक नाबालिग बालिका खुद सामने आकर कथित साक्ष्य पुलिस को दे रही थी, तब तत्काल कानूनी कार्रवाई करने के बजाय समझौते की बात क्यों की गई?
जिला पंचायत अध्यक्ष के फोन को लेकर भी गंभीर दावा
सहेली की मां ने आयोग उपाध्यक्ष को बताया कि जब वह थाने में मौजूद थीं, उसी दौरान उनके मोबाइल पर राजनांदगांव जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती किरण रविन्द्र वैष्णव का फोन आया सहेली की मां बताया कि फोन पर मामले में समझौता करने के लिए कहा गया,
उनका कहना है कि उन्होंने जिला पंचायत अध्यक्ष से पीड़ित बालिका को न्याय दिलाने में सहयोग की अपेक्षा की थी, लेकिन कथित तौर पर उन्हें भी समझौता करने की बात कही गई,
यदि यह आरोप सही है तो सवाल गंभीर है
एक नाबालिग पीड़िता न्याय की मांग लेकर सामने आई थी, ऐसे में उसके पक्ष में खड़े होने के बजाय कथित रूप से समझौते का रास्ता क्यों सुझाया गया?
दोबारा फोन आया तो बालिका ने खुद मांगा फोन
सहेली की मां के अनुसार, कार्रवाई के दौरान जिला पंचायत अध्यक्ष की ओर से एक बार फिर फोन आया और कथित तौर पर कहा गया कि एक बार और सोच लो, समझौता कर लो,
सहेली की मां के मुताबिक, यह सुनकर पीड़ित बालिका ने उनसे फोन मांगा और खुद बात करने की इच्छा जताई, उसने कथित रूप से कहा कि उसे बार-बार क्यों परेशान किया जा रहा है, वह आरोपियों को सजा दिलाना चाहती है अब रखो, सहेली की मां ने यही बात आयोग उपाध्यक्ष एमडी ठाकुर को बताई
जिस बच्ची ने कथित उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई, क्या उसकी आवाज को समझौते के दबाव में दबाया जाना चाहिए था?
स्कूल प्राचार्य और स्टाफ की भूमिका पर भी सवाल
पीड़ित पक्ष का आरोप है कि आरोपी शिक्षक के पक्ष में स्कूल के प्राचार्य और स्टाफ भी थाने पहुंचे थे,
अब सवाल यह है
क्या स्कूल प्रबंधन का पहला दायित्व आरोपी कर्मचारी को बचाना था या नाबालिग छात्रा की सुरक्षा और निष्पक्ष जांच में सहयोग करना?
यदि पीड़िता द्वारा पुलिस के सामने साक्ष्य प्रस्तुत किए जा रहे थे, तो स्कूल प्रबंधन की भूमिका भी जांच का विषय क्यों नहीं होनी चाहिए?
SP से संपर्क का दावा, WhatsApp पर साक्ष्य भेजने की बात
सहेली की मां ने बताया कि जब थाना प्रभारी द्वारा कथित रूप से रिपोर्ट दर्ज नहीं की जा रही थी और समझौते की बात कही जा रही थी, तब उन्होंने स्वयं पुलिस अधीक्षक श्रीमती अंकिता शर्मा से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया, उनका कहना है कि फोन नहीं उठाया गया, इसके बाद उन्होंने WhatsApp कॉल करने का भी प्रयास किया, सहेली की मां के मुताबिक, उन्होंने SP के WhatsApp नंबर पर आरोपियों से संबंधित साक्ष्य एवं अन्य सामग्री भी भेजी थी, जो उनके मोबाइल में मौजूद होने की बात उन्होंने आयोग उपाध्यक्ष को बताई,
यदि यह दावा सही है तो सवाल है
शिकायत और कथित साक्ष्य पहुंचने के बाद भी कार्रवाई में देरी क्यों हुई?
आखिरकार करीब तीन दिन बाद नाबालिग की शिकायत पर FIR दर्ज की गई,
पीड़ित पक्ष का कहना है कि यदि पुलिस ने शिकायत मिलने के समय ही कानून के अनुसार कार्रवाई शुरू कर दी होती तो संभव है कि फरार आरोपी भी पुलिस की गिरफ्त में होता,
मामले में तिलक यदु, शिक्षक और रमीज रजा कुरैशी, गैंदाटोला के खिलाफ कार्रवाई की है, एक आरोपी गिरफ्तार हुआ है, जबकि दूसरा आरोपी फरार बताया जा रहा है,
पुलिस से उपलब्ध जानकारी के अनुसार मामले में BNS की धारा 75(1) और POCSO Act के तहत प्रकरण दर्ज किया है, पीड़िता के अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित होने के कारण जाति प्रमाण-पत्र एवं विवेचना के तथ्यों के आधार पर SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी जोड़ी जाएगी,
आयोग उपाध्यक्ष खुद थाना पहुंचे, TI को लगाई फटकार
पीड़ित परिवार और सहेली की मां से पूरे मामले की जानकारी लेने के बाद आयोग उपाध्यक्ष श्री एमडी ठाकुर पुलिस थाना गैंदाटोला भी पहुंचे,
उन्होंने थाना प्रभारी से मामले की पूरी जानकारी ली और नाबालिग की रिपोर्ट दर्ज करने में हुई देरी तथा कथित रूप से समझौते के लिए प्रेरित किए जाने के आरोपों को गंभीरता से लिया,
आयोग उपाध्यक्ष ने थाना प्रभारी को इस मामले में फटकार लगाई और पुलिस को निष्पक्ष एवं गंभीरता से कार्रवाई करने के निर्देश दिए, उन्होंने मामले में फरार आरोपी को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने तथा विवेचना में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं बरतने के निर्देश भी दिए,
अब आयोग उपाध्यक्ष के थाना पहुंचने और थाना प्रभारी को फटकार लगाए जाने के बाद पुलिस विभाग की जवाबदेही का सवाल और बड़ा हो गया है,
TI पर क्या होगी कार्रवाई?
यदि नाबालिग की शिकायत पर FIR दर्ज करने में वास्तव में तीन दिन की देरी हुई और शिकायतकर्ता पक्ष के आरोप के अनुसार समझौते के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया गया,
तो अब सवाल सीधे पुलिस अधीक्षक अंकिता शर्मा मैडम से है,
क्या SP मैडम पूरे घटनाक्रम की विभागीय जांच कराएंगी?
क्या यह जांच केवल आरोपियों तक सीमित रहेगी या FIR में देरी और कथित समझौते के प्रयास की भी जांच होगी?
यदि थाना प्रभारी की भूमिका में लापरवाही या नियमों के विपरीत कार्रवाई सामने आती है, तो क्या उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी?
और सबसे अहम….
जब मामला एक नाबालिग बालिका से जुड़ा था, तो FIR दर्ज करने में तीन दिन क्यों लगे?
TI सहेली की मां के घर क्यों पहुंचीं?
सहेली की मां ने आयोग उपाध्यक्ष के सामने एक और सवाल उठाया,
उनका कहना है कि शिकायत बाद से गैंदाटोला थाना प्रभारी उनके गांव स्थित घर पहुंची थीं, उस समय सहेली की मां घर पर मौजूद नहीं थीं, घर पर उनके पति थे, उनके अनुसार थाना प्रभारी उनके पति से मिले चाय पी और बिना कुछ बोले वापस चले गये,
अब सवाल यह है
पीड़ित बालिका के मामले में शिकायतकर्ता पक्ष के साथ लगातार संपर्क में रहने वाली सहेली की मां के घर थाना प्रभारी आखिर किस उद्देश्य से पहुंचे थे?
क्या यह सामान्य मुलाकात थी या मामले से संबंधित कोई कारण था?
इसका जवाब भी संबंधित थाना प्रभारी और पुलिस विभाग को स्पष्ट करना होगा,
महिला जनप्रतिनिधि और महिला पुलिस नेतृत्व पर भी सवाल
इस मामले में एक बेहद संवेदनशील पहलू यह भी है कि जिला पंचायत अध्यक्ष स्वयं महिला हैं, ऐसे में पीड़ित पक्ष का कहना है कि उन्हें न्याय दिलाने में सहयोग की उम्मीद थी,
यदि वास्तव में समझौते के लिए दबाव डाला गया था, तो सवाल उठना स्वाभाविक है,
क्या एक महिला जनप्रतिनिधि को नाबालिग पीड़िता के पक्ष में खड़े होकर कानूनसम्मत कार्रवाई के लिए आवाज नहीं उठानी चाहिए थी?
इसी तरह पुलिस विभाग में वरिष्ठ स्तर पर महिला अधिकारी के नेतृत्व में काम कर रही पुलिस व्यवस्था पर भी सवाल है,
जब एक नाबालिग बालिका थाने पहुंचकर शिकायत कर रही थी, तो FIR तत्काल दर्ज क्यों नहीं हुई?
यदि थाना स्तर पर लापरवाही हुई, तो क्या वरिष्ठ अधिकारी इस पर जवाबदेही तय करेंगे?
नाबालिग की आवाज को समझौते में नहीं दबाया जा सकता
यह पूरा मामला केवल दो आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है,
एक नाबालिग बालिका ने कथित शोषण के खिलाफ आवाज उठाई है, उसने अपने परिवार और भरोसेमंद लोगों को अपनी परेशानी बताई और फिर पुलिस तक पहुंचने की हिम्मत दिखाई,
ऐसे मामलों में पीड़िता को सुरक्षा, सम्मान और कानून के अनुसार निष्पक्ष कार्रवाई मिलना बेहद जरूरी है,
यदि शिकायत के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा समझौते का दबाव बनाया गया या कार्रवाई को प्रभावित करने का प्रयास किया गया, तो इसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए,
प्रहरी न्यूज के सीधे सवाल
1. नाबालिग की शिकायत पर FIR दर्ज करने में तीन दिन क्यों लगे?
2. क्या थाने में आरोपी पक्ष और स्कूल प्रबंधन को बुलाकर समझौते की कोई कोशिश की गई थी?
3. पीड़िता द्वारा कथित WhatsApp साक्ष्य दिखाने के बावजूद तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
4. जिला पंचायत अध्यक्ष के कथित फोन और समझौते की सलाह की क्या जांच होगी?
5. सहेली की मां द्वारा SP को फोन और WhatsApp पर साक्ष्य भेजने के दावे की जांच होगी या नहीं?
6. कार्रवाई के बाद थाना प्रभारी सहेली की मां के घर क्यों पहुंचीं थीं?
7. यदि पहले दिन FIR दर्ज होती तो क्या फरार आरोपी को पकड़ने में पुलिस को आसानी होती?
8. आयोग उपाध्यक्ष द्वारा थाना प्रभारी को फटकार लगाए जाने के बाद क्या पुलिस विभाग TI की भूमिका की विभागीय जांच करेगा?
9. यदि जांच में लापरवाही या समझौते के लिए दबाव की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी?
अब जांच और जवाबदेही दोनों जरूरी
आयोग उपाध्यक्ष श्री एमडी ठाकुर द्वारा मामले को गंभीरता से लेते हुए पीड़ित पक्ष से जानकारी लेना, थाना पहुंचकर पुलिस कार्रवाई की जानकारी लेना और फरार आरोपी की जल्द गिरफ्तारी के निर्देश देना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कदम है,
लेकिन अब असली परीक्षा पुलिस विभाग की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की है,
एक आरोपी गिरफ्तार हो चुका है और दूसरा फरार बताया जा रहा है, अब पुलिस को फरार आरोपी की गिरफ्तारी के साथ-साथ उन सभी सवालों का जवाब भी तलाशना होगा, जो FIR में देरी, कथित समझौते के प्रयास और पुलिस की शुरुआती भूमिका को लेकर उठ रहे हैं,
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आरोपी कौन है, सवाल यह भी है कि एक नाबालिग न्याय मांगने थाने पहुंची तो उसे न्याय तक पहुंचने में तीन दिन क्यों लगे?
प्रहरी न्यूज का पक्ष
इस रिपोर्ट में पीड़ित परिवार और सहेली की मां द्वारा आयोग उपाध्यक्ष के सामने बताए गए आरोपों और घटनाक्रम के आधार पर है, इन आरोपों को सिद्ध और तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है, संबंधित पुलिस अधिकारी, जिला पंचायत अध्यक्ष, स्कूल प्रबंधन अथवा अन्य संबंधित पक्ष का आधिकारिक रूप से सामने आने पर उसे भी निष्पक्ष रूप से प्रकाशित किया जाएगा, नाबालिग की पहचान नाम पता कानून के अनुरूप गोपनीय रखी गई है,