प्रहरी लेख – खुज्जी विधानसभा क्षेत्र की राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, उसे देखकर एक सवाल बार-बार उठता है, क्या सच में राजनीति से वह आत्मा खत्म हो गई, जो कभी जनता के बीच सांस लेती थी?
एक समय था जब छुरिया की राजनीति किसी पद, प्रचार या दिखावे से नहीं, बल्कि एक नाम से चलती थी, राजिंदरपाल सिंह भाटिया, यह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक दौर था, एक ऐसा दौर, जिसमें नेता और जनता के बीच कोई दीवार नहीं थी।
भाटिया जी की सबसे बड़ी पहचान उनका पद नहीं, बल्कि उनका अपनापन था, वे उन नेताओं में से नहीं थे जो भीड़ देखकर पहचान बनाते हैं, बल्कि वे हर व्यक्ति को नाम से जानते थे, आज के समय में जब नेता अपने ही क्षेत्र के लोगों से कटे हुए नजर आते हैं, तब भाटिया जी की खासियत को याद कर मन चुभ सी जाती है।
निमंत्रण उनके लिए औपचारिकता नहीं था, वह एक रिश्ता था, चाहे किसी गरीब का घर हो या किसी साधारण परिवार का कार्यक्रम, भाटिया जी बिना सोचे-समझे पहुंच जाते थे, आज के नेताओं के लिए यह बात शायद “छवि बनाने” का हिस्सा हो सकती है, लेकिन भाटिया जी के लिए यह उनका स्वभाव था।
राजनीति में उतार-चढ़ाव हर किसी के जीवन का हिस्सा होता हैं, लेकिन भाटिया जी ने कभी अपने मूल चरित्र से समझौता नहीं किया, उन्होंने सत्ता देखी, संघर्ष भी देखा, और कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया, लेकिन जनता से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा,
सबसे बड़ी बात, वे सिर्फ आश्वासन नहीं देते थे, समाधान देते थे, कोई भी व्यक्ति अपनी समस्या लेकर उनके पास जाता, तो उसे भरोसा होता कि बात यहीं खत्म नहीं होगी, भाटिया जी खुद सरकारी दफ्तरों तक पहुंचते थे, फोन उठाते थे, और तब तक पीछे नहीं हटते थे जब तक समस्या का हल नहीं निकल जाता,
आज हालात बिल्कुल उलटा हैं, जनता दर-दर भटकती है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं, नेता दिखाई देते हैं, पर सिर्फ मंचों पर, पोस्टरों में और सोशल मीडिया पर,
भाटिया जी के जाने के बाद जो खालीपन पैदा हुआ है, वह सिर्फ एक नेता के चले जाने का नहीं है, यह एक सोच, एक संस्कृति और एक जिम्मेदारी के खत्म हो जाने से भी है, ऐसा लगता है जैसे छुरिया की राजनीति अपनी जड़ों से उखड़ गई हो,
आज भी जब लोग और उनके समर्थक भाटिया जी को याद करते हैं, तो उनकी आंखों में सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि एक दर्द भी नजर आता है, उस दौर को खो देने का दर्द, जब नेता “अपना” हुआ करता था,
उनके पुत्र लक्की भाटिया जरूर इस विरासत को संभालने की कोशिश कर रहे हैं, वे लोगों के बीच जा रहे हैं, उनके सुख-दुख में शामिल हो रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या आज की राजनीति में उस स्तर की संवेदनशीलता और प्रतिबद्धता बची है, जो भाटिया जी की पहचान थी?
कड़वी सच्चाई यह है कि आज के समय में “भाटिया जी जैसे नेता” मिलना लगभग असंभव सा हो गया है,
और इसलिए, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी “भाटिया जी के जाने के बाद छुरिया और खुज्जी विधानसभा की राजनीति सिर्फ बदल नहीं गई, बल्कि कहीं खो गई है।”
प्रहरी न्यूज – ऐसे जननेता स्व. राजिंदरपाल सिंह भाटिया जी को याद कर सादर नमन करता है,