✍️ संपादकीय,
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और नुकसान से सुरक्षा देना है, लेकिन जब इसी योजना में आंकड़ों का इतना बड़ा अंतर सामने आए और जिम्मेदार तंत्र खामोश नजर आए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है,
छुरिया तहसील के ग्राम खोभा का मामला अब सिर्फ एक गांव का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सुशासन की कसौटी बन चुका है,

रबी मौसम 2024–25 के सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि ग्राम खोभा में चना की खेती कुल 45.485 हेक्टेयर में हुई, यह आंकड़ा स्पष्ट और आधिकारिक है, लेकिन इसी गांव में चना का बीमा 281 हेक्टेयर के लिए किया जाना एक ऐसा अंतर दिखाता है, जिसे सामान्य त्रुटि मानना मुश्किल है,

यह अंतर लगभग 235 हेक्टेयर का है, और इतना बड़ा अंतर किसी भी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है,

सवाल यह नहीं है कि गलती हुई या नहीं, सवाल यह है कि इतने स्पष्ट अंतर के बाद भी अब तक कोई जांच क्यों नहीं हुई?
क्यों कोई टीम गठित नहीं की गई?
क्यों जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब नहीं मांगा गया?
जब तथ्य सामने हों और कार्रवाई न हो, तो संदेह और गहराता है…
यह भी याद रखने वाली बात है कि छुरिया क्षेत्र में पहले भी फर्जी फसल बीमा के मामले सामने आ चुके हैं, जहां जांच के बाद दोषियों पर कार्रवाई हुई और उन्हें जेल तक जाना पड़ा,
यानी प्रशासन के पास अनुभव और उदाहरण दोनों मौजूद हैं, फिर भी इस बार चुप्पी क्यों है, यही वह सवाल है, जो आम लोगों के मन में लगातार उठ रहा है,
आज प्रदेश में सुशासन और पारदर्शिता की बात की जाती है,
सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई का संदेश देती है, प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में “सुशासन” को प्राथमिकता बताया जाता है, लेकिन जब जमीनी स्तर पर इतने गंभीर मामले में कार्रवाई न हो, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है…
क्या सुशासन केवल घोषणाओं में है, या फिर जमीन पर भी दिखाई देगा?
जिला प्रशासन, विशेष रूप से कलेक्टर, शासन का सबसे महत्वपूर्ण प्रतिनिधि होता है, ऐसे में उनकी भूमिका निर्णायक होती है, जब जनता और मीडिया सवाल उठा रहे हों, तब प्रशासन की चुप्पी स्थिति को और संदिग्ध बना देती है,
पारदर्शिता का मतलब केवल योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि शिकायत और संदेह सामने आने पर तुरंत जांच और कार्रवाई करना भी है,
इस पूरे प्रकरण में सबसे जरूरी बात यह है कि सच्चाई सामने आए, चाहे वह किसी के पक्ष में हो या विरोध में, अगर वास्तव में कोई गड़बड़ी हुई है, तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए,
और यदि आंकड़ों में कोई तकनीकी त्रुटि है, तो उसे भी स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए, लेकिन चुप्पी किसी भी स्थिति में समाधान नहीं हो सकता,
आज जरूरत है कि जिला प्रशासन तुरंत जांच टीम गठित करे, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक करे, यही कदम जनता के विश्वास को मजबूत करेगा, और सुशासन के दावे को वास्तविकता में बदलने का सबसे प्रभावी तरीका भी होगा।