लोकतंत्र पर पहरा?

प्रहरी न्यूज राजनांदगांव/डोंगरगढ़ : चैत्र नवरात्रि मेले की तैयारियों को लेकर डोंगरगढ़ स्थित माँ बम्लेश्वरी धाम में आयोजित समीक्षा बैठक उस समय विवादों में घिर गई, जब जिला कलेक्टर जितेंद्र यादव का एक कथित निर्देश मीडिया के बीच चर्चा का विषय बन गया। बैठक में मौजूद पत्रकारों के अनुसार, जब वे मेले की व्यवस्थाओं और प्रशासनिक तैयारियों की जानकारी जुटाने के लिए कवरेज कर रहे थे, तब कलेक्टर साहब ने कहा—
“खबर आपको पीआरओ से मिल जाएगी।”
यह एक साधारण वाक्य भर नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रशासनिक नियंत्रण की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
❓क्या सच से डरता है प्रशासन?
चैत्र नवरात्रि मेले की तैयारियों को लेकर आयोजित इस बैठक में संभाग आयुक्त, आईजी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। ऐसे में पत्रकारों का उद्देश्य था कि वे सीधे मौके से जानकारी लेकर जनता तक पहुंचाएं।
लेकिन सवाल उठता है—
❓ अगर पत्रकारों को केवल जनसंपर्क विभाग (PRO) से ही खबर लेनी है तो फिर फील्ड का उद्देश्य ही क्या रह जाएगा?
❓ क्या पत्रकारों को सीधे सवाल पूछने से रोकना प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल नहीं खड़ा करता?
❓ क्या लोकतंत्र में मीडिया को केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़ने वाला माध्यम बना दिया जाएगा?
❓पीआरओ पत्रकारिता या सरकारी संस्करण?
जनसंपर्क विभाग का काम सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की जानकारी देना होता है, लेकिन पत्रकारिता का काम सिर्फ प्रेस नोट छापना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना भी है।
अगर पत्रकारों को सिर्फ वही खबर छापनी पड़े जो प्रशासन देना चाहता है, तो फिर कई गंभीर सवाल पैदा होते हैं—
❓ क्या मीडिया की भूमिका केवल सरकारी उपलब्धियों का गुणगान करने तक सीमित कर दी जाएगी?
❓ क्या प्रशासन की कमियों और अव्यवस्थाओं पर सवाल पूछना अब “अपराध” बन जाएगा?
❓ क्या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब प्रेस नोट पर निर्भर होकर रह जाएगा?
❓क्या संविधान की भावना के खिलाफ है ऐसा रवैया?
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसी के तहत मीडिया को भी स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार मिला है।
ऐसे में सवाल उठता है—
❓ क्या पत्रकारों को कवरेज से रोकना और उन्हें पीआरओ तक सीमित करना अप्रत्यक्ष सेंसरशिप नहीं है?
❓ क्या यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं मानी जाएगी?
❓अगर सवाल नहीं पूछे जाएंगे तो जवाबदेही कैसे तय होगी?
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है सत्ता से सवाल करना और जनता को सच बताना।
लेकिन —
पत्रकार फोटो-वीडियो न ले सकें,
मौके पर सीधे सवाल न पूछ सकें,
और खबर केवल प्रेस नोट से तय हो,
तो फिर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—
❓ क्या पत्रकार सिर्फ सरकारी मुनादी करने वाले कर्मचारी बनकर रह जाएंगे?
लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही तय करने का सबसे बड़ा माध्यम मीडिया है।
ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है—
❓ क्या डोंगरगढ़ में पत्रकारिता को “पीआरओ पत्रकारिता” बनाने की कोशिश हो रही थी, या फिर यह केवल एक गलतफहमी है, जिसे प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए?